पीड़ा में आज्ञाकारिता

पतरस का पहला पत्र मसीह में अपने विश्वास के कारण पीड़ित लोगों के लिए लिखा गया था। ऐसा कहा जाता है कि रोमन अधिकारियों द्वारा उन पर किए गए उत्पीड़न से खुद को बचाने के लिए वे विभिन्न प्रांतों में तितर-बितर हो गए। इतिहास दर्ज करता है कि कई वफादार विश्वासियों को क्रूस पर चढ़ाया गया और मशालों की तरह जला दिया गया। विश्वासियों के इस बिखरे हुए समूह को उनके विश्वास में मजबूत करने के लिए, पतरस ने यह पत्र लिखा।

सदियों से, सच्चे विश्वासी इस दुनिया में सबसे अधिक सताए गए लोगों में से रहे हैं। अब भी, हममें से हर कोई, किसी न किसी तरह, अपने जीवन में विभिन्न कठिनाइयों से गुज़र रहा है। परिणामस्वरूप, कभी-कभी, हमारा विश्वास डगमगा जाता है, और हम धीरे-धीरे मसीह में अपने आत्मिक धन को खो देते हैं। हम निराश महसूस करते हैं और ऐसी मानसिकता विकसित कर लेते हैं जो जीवन के कठिन क्षणों के दौरान हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता, यीशु मसीह की वफादारी पर संदेह करती है।

आज्ञाकारिता के लिए दिशानिर्देश

जैसे ही हम इस पत्र के पन्ने पलटते हैं, एक विषय जो उभरकर सामने आता है वह है ‘आज्ञाकारिता या अधीनता’ के बारे में। प्रेरित पतरस के पास जीवन की कठिन परीक्षाओं से गुज़रते समय एक मसीही के जीवन में आज्ञाकारिता के बारे में कहने के लिए कई प्रासंगिक बातें हैं, जैसा कि नीचे सूचीबद्ध है।

  • हमें यीशु मसीह के आज्ञाकारी होने के लिए चुना गया है (1 पतरस 1:2)।
  • हमें आज्ञाकारी बच्चों की तरह व्यवहार करना है (1 पतरस 1:14)।
  • हमें प्रभु के लिए प्रत्येक मानव निर्मित अधिकार का पालन करने का निर्देश दिया गया है, चाहे वह सम्राट हो या राज्यपाल (1 पतरस 2:13-14)।
  • नौकरों से कहा जाता है कि वे पूरे सम्मान के साथ अपने मालिकों की आज्ञा का पालन करें, न केवल अगर वे दयालु और उचित हैं, बल्कि भले ही वे सख्त और क्रूर हों (1 पतरस 2:18)।
  • जैसे सारा इब्राहीम का आदर करती थी और उसकी आज्ञाकारी थी, वैसे ही पत्नियों को भी अपने पतियों का आदर करना चाहिए और उनकी आज्ञाकारी रहना चाहिए। (1 पतरस 3:1-6)।
  • नवयुवकों को बड़ों के अधीन रहना चाहिए (1 पतरस 5:5)।
  • अंत में, अगुवे और विश्वासियों से समान रूप से एक-दूसरे के प्रति आज्ञाकारी या विनम्र होने का आग्रह किया जाता है (1 पतरस 5:5)।

पीड़ा और आज्ञाकारिता की भूमिका

जब आप आज्ञाकारी रूप से कष्ट सहन करते हैं तो परमेश्वर आपके जीवन में अपने दिव्य उद्देश्य को क्रियान्वित करते हैं। कठिनाई आने पर व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। पुराने नियम में, मिस्र से बाहर निकालने में ईश्वर के शक्तिशाली हाथ का अनुभव करने के बावजूद, जब भी इज़राइलियों को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, उन्होंने मूसा और परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह किया। हालाँकि अय्यूब की पत्नी ने कई वर्षों तक एक धन्य पारिवारिक जीवन का आनंद लिया था, लेकिन जब उसकी सारी सांसारिक सुख-सुविधाएँ छीन ली गईं तो उसने खुले तौर पर परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह किया। याद रखें, जंगल की कठिन यात्रा के बाद, दूध और शहद से बहने वाली एक भूमि इस्राएलियों की प्रतीक्षा कर रही थी। केवल वे ही लोग इसमें प्रवेश कर पाए जिन्होंने बिना शर्त आज्ञा का पालन किया, जबकि बाकी लोग जंगल में नष्ट हो गए। अपने दिव्य उद्देश्यों को पूरा करने के बाद, प्रभु ने अय्यूब की समृद्धि बहाल की और उसकी संपत्ति दोगुनी कर दी।

यीशु मसीह ने दु:ख उठा–उठाकर आज्ञा माननी सीखी, और सिद्ध बनकर, अपने सब आज्ञा माननेवालों के लिये सदा काल के उद्धार का कारण हो गया (इब्रानियों 5:8,9)। उसने क्रूस पर एक अपराधी के रूप में वेदनाओं को सहते हुए, मृत्यु तक आज्ञाकारी रहकर खुद को विनम्र बनाया। इस कारण परमेश्‍वर ने उसको अति महान् भी किया, और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्‍ठ है (फिलिप्पियों 2:8,9)। कष्ट सहते हुए भी आज्ञाकारी बने रहना कोई आसान काम नहीं है और यीशु मसीह के लिए भी यह आसान नहीं था। गतसमने के बगीचे में, उसने आने वाली पीड़ा और क्रूस पर मृत्यु से मुक्ति की मांग करते हुए, स्वर्गीय पिता से ज़ोर से चिल्लाकर और आंसुओं के साथ प्रार्थना की। उसकी प्रार्थनाओं के उत्तर में, परमपिता परमेश्वर ने उसके जीवन से कष्ट और क्रूस पर मृत्यु की घटना को दूर नहीं किया, बल्कि उसे इसे सहने की शक्ति दी। परिणामस्वरूप, शैतान पराजित हो गया, और संपूर्ण मानवता के लिए मुक्ति का मार्ग खुल गया।

इसलिए, परमेश्वर हमारे जीवन में अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए पीड़ा को एक साधन के रूप में उपयोग करते हैं। जब हम अवज्ञा करते हैं और विद्रोह करते हैं, तो हम हमारे लिए परमेश्वर के इच्छित मार्ग में बाधा डालते हैं। कष्टों के बावजूद भी आज्ञाकारी बने रहने और आने वाली महिमा में भागीदार बनने का आज ही दृढ़ निर्णय लें। पवित्र आत्मा आपको परीक्षणों और कष्टों के बीच आज्ञाकारिता का जीवन जीने में मदद करे।

मरकुस-असफलताओं के बीच सफलता का प्रतीक

आप सभी को, प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के नाम में मेरा अभिवादन ।

मरकुस 14: 51-52 में हम, गिरफ्तार यीशु के पीछे एक युवक को जाते देखते हैं। उसने अपने नंगे शरीर पर केवल चादर ओढ़ा था। जब भीड़ ने उसे पकड़ा, तो वह अपने चादर को पीछे छोड़कर नंगा भाग गया। बाइबल के कई विद्वान इस बात से सहमत हैं कि यह युवक और कोई नहीं बल्कि खुद मरकुस था। वह यीशु के पीछे चलना चाहता था, लेकिन जब यीशु के साथ जुड़ने के कारण कठिनाई पैदा हुई, तो उसने अपना वस्त्र भी छोड़ दिया और नंगा भाग गया। वह यीशु का अनुसरण करना चाहता था लेकिन वह असफल रहा।

प्रथम मिशनरी यात्रा के दौरान मरकुस, पौलुस और बरनबास का सहायक था। लेकिन अचानक हम मरकुस को उन्हें छोड़कर यरूशलेम लौटते हुए देखते हैं। हम ठीक से नहीं जानते कि क्यों मरकुस वापस यरूशलेम लौट गया (प्रेरितों 13:5-13)। शायद, मिशनरी जीवन की कठिनाइयों ने उसे आगे बढ़ने से रोक दिया और उसे यरूशलेम में अपने घर के सुखद जीवन में वापस खींच लिया और मरकुस अपने कर्त्तव्य को छोड़कर भाग आया। मरकुस के गैरजिम्मेदाराना व्यवहार के कारण, पौलुस ने दूसरी मिशनरी यात्रा के लिए उसे लेने से लगातार इनकार कर दिया। यहां भी हमें मरकुस के जीवन में असफलता ही नजर आती है। मरकुस असफलता का प्रतीक बन गया था।

इस घटना के बाद, मरकुस दस साल के लिए नए नियम के इतिहास से गायब हो जाता है। दस साल बाद उसका नाम फिर दिखाई देता है कुलुस्सियों की पत्री  में और फिलेमोन की पत्री  में जिसे पौलुस ने रॉम में अपने प्रथम कारावास के दौरान लिखा था। कुलुस्सियों 4:10,11 में पौलुस लिखता है “अरिस्तर्खुस जो मेरे साथ कैदी है, और मरकुस जो बरनबास का भाई लगता है। जिसके विषय में तुम ने निर्देश पाया था कि यदि वह तुम्हारे पास आए, तो उससे अच्छी तरह व्यवहार करना। और यीशु जो यूस्तुस कहलाता है, तुम्हें नमस्कार कहते हैं। खतना किए हुए लोगों में से केवल ये ही परमेश्‍वर के राज्य के लिये मेरे सहकर्मी और मेरे लिए सांत्वना ठहरे हैं।” फिलेमोन की पत्री 1:24 में पौलुस लिखता है “और मरकुस और अरिस्तर्खुस और देमास और लूका जो मेरे सहकर्मी है; इनका तुझे नमस्कार।”

एक समय था जब पौलुस को मरकुस की संगत पसंद नहीं थी। लेकिन इस दस वर्षों के दौरान कुछ बदल गया और मरकुस पौलुस के लिए एक सहकर्मी और सांत्वना बन गया। उनके बीच यह करीबी रिश्ता पौलुस की मृत्यु तक बना रहा। वर्षों बाद, रोम में अपने दूसरे कारावास के दौरान जब पौलुस अपनी मृत्यु के करीब था, तब 2 तीमुथियुस 4:11 में वह लिखता है “मरकुस को लेकर चला आ; क्योंकि सेवा के लिये वह मेरे बहुत काम का है।“ हम देखते हैं कि मरकुस अब प्रेरित पौलुस का अनमोल साथी बन गया था।

इतना ही नहीं, मरकुस, प्रेरित पतरस का भी एक अनमोल साथी बन गया था। 1 पतरस 5:13 में वह लिखता है “जो बाबुल में तुम्हारी नाईं चुने हुए लोग हैं, वह और मेरा पुत्र मरकुस तुम्हें नमस्कार कहते हैं।” और पवित्र आत्मा ने मरकुस को बाइबिल के एक सुसमाचार को लिखने के लिए उपयोग किया।

मरकुस जिसे मुश्किलों को देखकर भागने की आदत थी,जो बेवफा, कायर, कमज़ोर और अपरिपक्व था प्रभु यीशु ने उसका जीवन बदल दिया। और उसको को नए नियम के दो महान प्रेरितों, पौलुस और पतरस, के अनमोल साथी होने का और बाइबिल के एक सुसमाचार को लिखने का सौभाग्य दिया। मरकुस जो विफलता का प्रतीक था प्रभु यीशु ने उसे विफलताओं के बीच सफलता का प्रतीक बना दिया।

मेरे प्यारे भाइयों और बहनों, यीशु के पीछे चलने की हमारी कोशिश में कई बार हमने भी विफलता के चरण को चूमा है। लेकिन मरकुस का जीवन हमें सिखाता है कि परमेश्वर कमजोर और असफल लोगों का उपयोग करता है। यदि आप गिर गए हैं, तो वापस उठो और फिर से मसीह की ओर देखो! यशायाह 42:3 में लिखा है “कुचले हुए नरकट को वह न तोड़ेगा और न टिमटिमाती बत्ती को बुझाएगा।” प्रभु आप सबको आशिष दे।

आत्मिक सलाहकार

आप सभी को, प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के नाम में मेरा अभिवादन ।

यदि आप इस पीढ़ी के महान व्यक्तित्वों को देखते हैं, तो आप पाएंगे कि उनमें से प्रत्येक के पास वफादार सलाहकार थे। और उनकी सलाह ने उन्हें ऊंचाइयों तक पहुंचाया। 

उदाहरण के लिए मार्क जकरबर्ग जो फेसबुक के सह संस्थापक हैं, इनके सलाहकार थे एप्प्ल  कंपनी के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स। बिल गेट्स जो माइक्रोसॉफ्ट के सह संस्थापक हैं, इनके सलाहकार थे दुनिया के महान निवेशक वारेन बफेट। और रिचर्ड ब्रानसन जो वर्जिन एटलांटिक एयरलाइंस के संस्थापक हैं, इनके सलाहकार थे लेकर एयरवेज के संस्थापक सर फ्रेडी लेकर। 

इसी तरह बाइबल में हम बरनबास को पौलुस और मरकुस के भरोसेमंद सलाहकार के रूप में देख सकते हैं। बरनबास अपने स्वभाव के कारण, प्रेरितों के बीच बहुत प्रतिष्ठित था। प्रेरितों ने उसे बरनबास नाम दिया था, जिसका अर्थ है “प्रोत्साहन का पुत्र”। 

रूपांतरण के लगभग तीन साल बाद, पौलुस यरूशलेम गया और उसने चेलों से जुड़ने की कोशिश की। लेकिन कलीसिया को सताए जाने के अपने पिछले इतिहास के कारण सब उससे डरते थे। उस समय बरनबास वह व्यक्ति था जिसने प्रेरितों से बात की और पौलुस के रूपांतरण की कहानी का सत्यापन किया। और आखिरकार, कलीसिया के भीतर पौलुस को स्वीकार कर लिया गया। (प्रेरितों के काम 9:26-30) इसके बाद पौलुस यरूशलेम में उनके साथ रहा और यीशु मसीह के बारे में प्रचार करता रहा। जब यहूदियों ने उसे मारने की कोशिश की, तो विश्वासियों ने उसे तरसुस भेज दिया जो उसकी मातृभूमि थी। 

इन घटनाओं के बाद लगभग नौ साल बीत चुके थे और पौलुस अभी भी अपनी मातृभूमि तरसुस में रहता था। कौन जानता है कि उस समय उसके दिमाग में क्या चल रहा था? क्या वह परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा कर रहा था? क्या वह नए नियम की तस्वीर से बाहर निकल रहा था? क्या वह अपनी मातृभूमि में बसने और प्रोफेसर बनने जा रहा था? हमें नहीं पता कि उसकी योजनाएँ क्या थीं। केवल एक चीज हमें पता है कि बरनबास तरसुस में पौलुस की तलाश में गया और उसने पौलुस को पाया। वह उसे अन्ताकिया ले आया और उसे सक्रिय मसीही सेवा में मिला दिया जिसने उसके जीवन और बाकी के इतिहास को बदल दिया। बरनबास ने नए नियम का एक शब्द भी नहीं लिखा। लेकिन बरनबास ने पौलुस के जीवन में वफादार सलाहकार की भूमिका निभाई। उसने पौलुस को प्रोत्साहित किया। बाद में हम देख सकते हैं कि इस पौलुस ने लगभग पचास प्रतिशत नए नियम की किताबो को लिखा। बरनबास वह प्रेरक शक्ति था जिसके माध्यम से पौलुस विश्वास के जीवन की ऊंचाइयों तक पहुंचा।

जब पौलुस ने बरनबास को दूसरी मिशनरी यात्रा का प्रस्ताव दिया, तो मरकुस के बारे में उनके बीच मतभेद पैदा हो गए। पौलुस  ने उसे लेने से इनकार कर दिया क्योंकि मरकुस पहली मिशनरी यात्रा के बीच में ही बाहर हो गया था और यरूशलेम में अपनी माँ के घर लौट आया था । पौलुस  की नज़र में, मरकुस एक कायर और अविश्वसनीय व्यक्ति था। लेकिन दूसरों को प्रोत्साहित करने वाले बरनबास ने मरकुस को अपने साथ ले जाने पर जोर दिया। इस घटना ने पौलुस  और बरनबास को अलग कर दिया।

बरनबास मरकुस को अपने साथ ले गया और उसे मसीही  सेवा में प्रोत्साहित किया। बाद में यह युवक मसीह के योग्य सेवक बन गया, और यहां तक ​​कि बाद में पौलुस  ने भी इस बात को स्वीकार किया। 2 तीमुथियुस 4:11 में पौलुस  कहता है “मरकुस  को लेकर चला आ; क्योंकि सेवा के लिये वह मेरे बहुत काम का है”। बाद में, मरकुस ने नए नियम की एक पुस्तक भी लिखी। मरकुस ने भी विश्वास के जीवन की ऊंचाइयों को हसिल किया ।

बरनबास के पास खुद को बड़ा दिखाने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी। उसने दूसरों की प्रसिद्धि और सफलता की परवाह खुद से ज्यादा की। यरूशलेम में चेलों ने पौलुस के भयानक इतिहास को देखा। पौलुस  ने मरकुस में पिछली विफलता देखी। लेकिन बरनबास ने दोनों में एक उज्ज्वल भविष्य देखा।

आने वाले दिनों में हमारी पीढ़ी के कई युवाओं के भरोसेमंद सलाहकार बनने में और उन्हें मसीही सेवा में प्रोत्साहित करने में परमेश्वर हमारी मदद करें। प्रभु आप सबको आशिष दे।